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वज्र शिरे ॥ शाश्वत निस्वर भाब परमं, शाश्वत सहज्र स्वभाव परमं २ एहि एहि जिन जिक समरे, काय निबन्धनरु चक्र धरे ॥ हूँ हूँ ह्रीँ ह्रीँ प्रज्ञा धृकस गतो, सेखर मण्डलत प्रवनव सुखे २ हूँ फट् आदीन चरन बरे, प्रनमामि सुरत वज्र शिरे ॥ ध्रु ॥ ❈ ॥ राग अहेडि ॥ तार झप ॥ हाद आभरणे, क्री यारि रे संवर, धरयिक वारि रे भेसा २ भुम्ह वोरन्ते मण्डलयः स्मस्वाने, म कुतकेसि दिगम्वः रा ॥ ले ले मोरुव सम्बररैया, सहज सुन्दरि मोरु कोरा