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Page:AN-PM-13.pdf/213

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ला ॥ १ ॥ चंचल हिदय थीरन होयिते परि भगति भारा ॥ चरन सर न गति जानि राषिय मोरा परि हरि सव अप राधे ॥ २ ॥ अपने रुप न जानित रुप रसिचिय अमित पाने ॥ नृपति जगत जय मल्ल मनोर थ पुरिय सेवक जानि रे ॥ ३ ॥ ६ ॥ १ राग ॥ मारि ॥ गड ॥ दुजयना ओन क्षि रो साग रे नोपा रे ॥ सु वने राक्षि रो जा नोये घने दुओ रे ॥ १ ॥ सु वने रो खात यात सु वने रो पुनी, सति पति प्रता जानो रानि मनो ध रि ॥ २ ॥ सु वने रो हात पात सु वने रो वास ॥ सु वने रो क्षि रो जा रो व